उज्जैन महापौर विवाद: अदालत का फैसला कभी भी, टटवाल या परमार… किसके नाम होगी कुर्सी?

 उज्जैन की राजनीति इन दिनों एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है—महापौर की कुर्सी पर मुकेश टटवाल कायम रहेंगे या महेश परमार को न्यायालय से राहत मिलेगी? वर्ष 2022 के नगर निगम चुनाव के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। हालिया सुनवाई के बाद संकेत मिल रहे हैं कि अदालत का फैसला कभी भी आ सकता है।




परिणाम के साथ ही शुरू हुई थी कानूनी लड़ाई

नगर निगम चुनाव 2022 में भाजपा प्रत्याशी मुकेश टटवाल ने कांग्रेस के महेश परमार को पराजित किया था। परिणाम घोषित होते ही महेश परमार ने मतगणना प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए जिला न्यायालय में चुनाव याचिका दायर कर दी।

उनका आरोप था कि डाक मतपत्रों की गणना, अमान्य मतों के परीक्षण और पुनर्गणना के आवेदन पर निर्णय में अनियमितताएँ हुईं। परमार ने दावा किया कि यदि पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा हो, तो परिणाम बदल सकता है।


टटवाल पक्ष की दलील: याचिका में ठोस आधार का अभाव

वर्तमान महापौर मुकेश टटवाल की ओर से अधिवक्ताओं ने अदालत में स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह विधिसम्मत रही। उन्होंने तर्क दिया कि याचिका तकनीकी आपत्तियों पर आधारित है और उसमें ठोस साक्ष्यों का अभाव है।

टटवाल पक्ष ने यह भी कहा कि पूरी चुनाव प्रक्रिया Madhya Pradesh नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के अनुरूप संपन्न हुई। इसलिए परिणाम को चुनौती देने का कोई वैधानिक आधार नहीं बनता।



अदालत का रुख: पहले तथ्य, फिर फैसला

हालिया सुनवाई में न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनीं। सूत्रों के अनुसार अदालत ने संकेत दिए हैं कि यदि प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर पाए जाते हैं, तो साक्ष्य परीक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब मामला अंतिम बहस के चरण में है। अदालत का निर्णय दो संभावनाएँ खोल सकता है—

  1. याचिका खारिज होने पर टटवाल का पद सुरक्षित रहेगा।

  2. याचिका स्वीकार होने पर पुनर्मतगणना या चुनाव निरस्तीकरण जैसे आदेश दिए जा सकते हैं।


डेढ़ वर्ष से अधिक समय से जारी सस्पेंस

नगर निगम चुनाव को डेढ़ वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन यह विवाद अभी तक शहर की राजनीति का केंद्र बना हुआ है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही संभावित निर्णय को लेकर सतर्क हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक पद तक सीमित नहीं है। इसका असर आगामी चुनावी रणनीतियों और स्थानीय समीकरणों पर भी पड़ सकता है।



लोकतंत्र की कसौटी पर चुनाव प्रक्रिया

यह पूरा प्रकरण चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा भी है। यदि अदालत तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट निर्णय देती है, तो इससे जनता का विश्वास मजबूत होगा। वहीं लंबी कानूनी प्रक्रिया से यह संदेश भी जाता है कि चुनाव परिणामों की न्यायिक समीक्षा लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


शहर की नजर अंतिम फैसले पर

उज्जैन के राजनीतिक गलियारों से लेकर आम नागरिकों तक, हर किसी की निगाह अब न्यायालय के निर्णय पर टिकी है। “महापौर मुकेश या महेश” का यह प्रश्न जल्द सुलझ सकता है।

अदालत का फैसला चाहे जो हो, वह न केवल नगर निगम की सत्ता का भविष्य तय करेगा, बल्कि शहर की राजनीति में नई दिशा भी निर्धारित करेगा।

अब देखना यह है कि न्याय की तुला किस ओर झुकती है—मौजूदा व्यवस्था के पक्ष में या परिवर्तन के संकेत के साथ।

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