भरी संसद में ख्वाजा आसिफ का अमेरिका पर हमला: क्या पाकिस्तान की विदेश नीति बदलने वाली है
( रघुवीर सिंह पंवार )
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के भाषण से शुरू हुई नई बहस—क्या बदलेगी पाकिस्तान की विदेश नीति? अफगानिस्तान युद्ध की भूमिका और अमेरिका के साथ संबंधों पर गहन विश्लेषण।
संसद से उठी कूटनीतिक गूंज
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ द्वारा दिया गया हालिया बयान केवल एक राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि दशकों पुरानी विदेश नीति की समीक्षा जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने अमेरिका पर आरोप लगाया कि उसने अफगान युद्धों के दौरान पाकिस्तान का उपयोग किया और बाद में उसे “अकेला छोड़ दिया”।
यह बयान ऐसे समय आया है जब दक्षिण एशिया में कूटनीतिक समीकरण बदल रहे हैं, वैश्विक शक्ति संतुलन पुनर्गठित हो रहा है और पाकिस्तान स्वयं आर्थिक व राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है—क्या यह बयान केवल घरेलू राजनीति का हिस्सा है या पाकिस्तान की विदेश नीति में संभावित बदलाव का संकेत?
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सहयोग और अविश्वास का रिश्ता
अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध हमेशा से जटिल रहे हैं।
1. 1980 का दशक: सोवियत-अफगान युद्ध
सोवियत संघ के अफगानिस्तान में प्रवेश के बाद अमेरिका ने “मुक्ति संघर्ष” को समर्थन दिया। पाकिस्तान इस रणनीति का केंद्रीय भागीदार बना।
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सीआईए और पाकिस्तान की आईएसआई के बीच सहयोग बढ़ा।
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मुजाहिदीन को प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराए गए।
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पाकिस्तान को भारी वित्तीय और सैन्य सहायता मिली।
लेकिन इस सहयोग की कीमत भी चुकानी पड़ी—कट्टरपंथ का उभार, हथियारों और ड्रग्स का प्रसार, और क्षेत्रीय अस्थिरता।
2. 2001 के बाद: आतंक के खिलाफ युद्ध
9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने “वार ऑन टेरर” की घोषणा की। पाकिस्तान ने फिर अमेरिका का साथ दिया।
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एयरस्पेस और लॉजिस्टिक सपोर्ट प्रदान किया।
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तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ कार्रवाई में भागीदारी की।
परिणामस्वरूप पाकिस्तान के भीतर आतंकवादी हमलों में वृद्धि हुई और हजारों नागरिक व सैनिक मारे गए।
ख्वाजा आसिफ का बयान इसी ऐतिहासिक संदर्भ को दोहराता है—कि पाकिस्तान ने दो बार महाशक्ति की रणनीति का साथ दिया, लेकिन स्थायी लाभ नहीं मिला।
संसद में दिया गया बयान: आत्मस्वीकृति या राजनीतिक रणनीति?
रक्षा मंत्री ने कहा कि 1980 के दशक का “जिहाद” वास्तव में भू-राजनीतिक खेल था, धार्मिक युद्ध नहीं। यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान की आधिकारिक राजनीति में इस प्रकार की स्वीकारोक्ति कम ही सुनने को मिलती है।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि 2001 में अमेरिका का साथ देना “एक और बड़ी गलती” थी।
क्या यह आत्ममंथन है?
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पाकिस्तान की राजनीति में पहली बार खुलकर यह स्वीकारोक्ति दिखी कि अतीत के निर्णयों ने देश को नुकसान पहुंचाया।
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यह सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के बीच नीतिगत मतभेदों की ओर भी संकेत हो सकता है।
या घरेलू राजनीति का दबाव?
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आर्थिक संकट, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता के बीच सरकार को जनता के सामने जवाबदेह होना पड़ रहा है।
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अमेरिका विरोधी रुख घरेलू समर्थन जुटाने का साधन भी हो सकता है।
अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों की वर्तमान स्थिति
आज अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते पहले जैसे रणनीतिक नहीं रहे।
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अमेरिका का फोकस अब इंडो-पैसिफिक और चीन पर है।
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भारत के साथ अमेरिका की बढ़ती निकटता पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय है।
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अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद पाकिस्तान की रणनीतिक उपयोगिता कम हो गई है।
ख्वाजा आसिफ का बयान संभवतः इसी बदले हुए परिदृश्य की प्रतिक्रिया है।
भारत-अमेरिका समीकरण और पाकिस्तान की चिंता
हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, तकनीक और व्यापारिक सहयोग बढ़ा है।
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क्वाड समूह में भारत की सक्रिय भूमिका
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रक्षा समझौते और संयुक्त अभ्यास
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व्यापार और तकनीकी साझेदारी
इन घटनाक्रमों ने पाकिस्तान को यह संदेश दिया है कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन उसके पक्ष में नहीं है। ऐसे में अमेरिका की आलोचना कर पाकिस्तान अपने नए रणनीतिक विकल्पों की तलाश का संकेत दे सकता है।
चीन फैक्टर: क्या पाकिस्तान का झुकाव और बढ़ेगा?
पाकिस्तान पहले से ही चीन के साथ “ऑल-वेदर फ्रेंडशिप” का दावा करता है।
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चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC)
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रक्षा सहयोग
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संयुक्त परियोजनाएं
यदि अमेरिका से दूरी बढ़ती है, तो पाकिस्तान का चीन पर निर्भरता और गहरी हो सकती है। हालांकि, इससे उसकी रणनीतिक स्वायत्तता सीमित हो सकती है।
धार्मिक राजनीति और “जिहाद” की पुनर्व्याख्या
रक्षा मंत्री द्वारा “जिहाद” शब्द की आलोचनात्मक व्याख्या पाकिस्तान के राजनीतिक विमर्श में बदलाव का संकेत है।
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यह कट्टरपंथी संगठनों को संदेश हो सकता है।
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अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह दिखाने का प्रयास भी हो सकता है कि पाकिस्तान अब चरमपंथ से दूरी बनाना चाहता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह केवल बयान तक सीमित रहेगा या नीतिगत बदलाव भी होंगे?
सैन्य-नागरिक संबंधों पर प्रभाव
पाकिस्तान में विदेश और सुरक्षा नीति पर सेना का प्रभाव ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहा है।
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यदि संसद में ऐसे बयान दिए जा रहे हैं, तो क्या यह सैन्य सहमति से है?
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या यह राजनीतिक नेतृत्व का स्वतंत्र रुख है?
विश्लेषकों का मानना है कि बिना सैन्य समर्थन के इतना बड़ा बयान संभव नहीं। इसका अर्थ है कि पाकिस्तान के सत्ता ढांचे में भी नीति पर पुनर्विचार चल रहा है।
आर्थिक आयाम: सहायता, कर्ज और निर्भरता
अमेरिका से दूरी का अर्थ आर्थिक चुनौतियां भी हो सकता है।
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आईएमएफ और विश्व बैंक में अमेरिका का प्रभाव
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सैन्य सहायता और तकनीकी सहयोग
यदि संबंध और बिगड़ते हैं, तो पाकिस्तान को वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
क्या बदलेगी पाकिस्तान की विदेश नीति?
संभावित परिदृश्य:
1. प्रतीकात्मक बयानबाजी
बयान घरेलू राजनीति तक सीमित रह सकता है, और व्यावहारिक स्तर पर संबंध सामान्य बने रहेंगे।
2. रणनीतिक पुनर्संतुलन
पाकिस्तान अमेरिका से दूरी बनाकर चीन, रूस या मध्य एशिया की ओर झुकाव बढ़ा सकता है।
3. बहुध्रुवीय कूटनीति
पाकिस्तान संतुलन की नीति अपनाकर सभी महाशक्तियों से संबंध बनाए रखने की कोशिश कर सकता है।
दक्षिण एशिया पर संभावित प्रभाव
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भारत-पाक संबंधों में प्रत्यक्ष बदलाव की संभावना कम है।
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अफगानिस्तान में स्थिरता की दिशा में सहयोग की जरूरत बनी रहेगी।
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क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में चीन की भूमिका और मजबूत हो सकती है।
निष्कर्ष: बयान से आगे की राह
ख्वाजा आसिफ का संसद में दिया गया बयान पाकिस्तान की विदेश नीति के अतीत की सार्वजनिक समीक्षा जैसा है। यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है कि महाशक्तियों के खेल में शामिल होने की कीमत देश को भारी पड़ी।
लेकिन असली प्रश्न यह है—क्या यह आत्ममंथन नीति में ठोस बदलाव लाएगा?
यदि पाकिस्तान वास्तव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाना चाहता है, तो उसे संतुलित, पारदर्शी और दीर्घकालिक विदेश नीति अपनानी होगी। केवल बयानबाजी से न तो आर्थिक संकट हल होगा और न ही क्षेत्रीय अस्थिरता कम होगी।
दक्षिण एशिया की राजनीति में यह वक्तव्य एक संकेत है कि पुरानी धारणाएं टूट रही हैं और नई वास्तविकताओं को स्वीकार करने का समय आ गया है।
आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि संसद में उठी यह आवाज इतिहास की गूंज बनकर रह जाती है या पाकिस्तान की नई कूटनीतिक दिशा की शुरुआत साबित होती है।
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