सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और रियल एस्टेट सेक्टर की हकीकत पर एक विश्लेषण
(Raghuvir singh panwar )
क्या सचमुच RERA को खत्म कर देना चाहिए?
देश में घर खरीदना केवल एक आर्थिक निवेश नहीं, बल्कि जीवन भर का सपना होता है। मध्यम वर्ग की कमाई का बड़ा हिस्सा एक फ्लैट या मकान में लगता है। ऐसे में जब 2016 में रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) कानून लागू हुआ, तो करोड़ों घर खरीदारों को लगा कि अब उन्हें एक मजबूत कानूनी सुरक्षा मिल गई है।
लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी— “अगर RERA अपने उद्देश्य से भटक गया है तो इसे खत्म कर देना बेहतर”— ने इस पूरे तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह टिप्पणी केवल एक अदालत की नाराजगी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की समीक्षा का संकेत है, जिसे घर खरीदारों की ढाल माना जाता था।
RERA: उम्मीदों का कानून
RERA का मूल उद्देश्य था—
-
रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता लाना
-
बिल्डरों की मनमानी पर रोक लगाना
-
समय पर प्रोजेक्ट पूरा करवाना
-
खरीदारों को त्वरित न्याय दिलाना
इस कानून के बाद हर राज्य में RERA प्राधिकरण बना। बिल्डरों को प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन, फंड उपयोग और समयसीमा का पालन अनिवार्य किया गया।
शुरुआत में यह कदम ऐतिहासिक माना गया। हजारों फंसे प्रोजेक्ट्स में खरीदारों को राहत मिली। लेकिन समय के साथ सवाल उठने लगे— क्या RERA उतनी प्रभावी है, जितनी उम्मीद की गई थी?
सुप्रीम कोर्ट की चिंता: आखिर RERA किसके लिए?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया कि RERA आखिर किसके हित में काम कर रही है?
अगर—
-
खरीदारों को वर्षों तक सुनवाई का इंतजार करना पड़े
-
आदेशों का पालन न हो
-
डिफॉल्टर बिल्डर कानूनी प्रक्रियाओं का सहारा लेकर राहत पा जाएं
तो फिर यह संस्था अपने मूल उद्देश्य से भटकती हुई नजर आती है।
अदालत की यह टिप्पणी दरअसल एक चेतावनी है— सुधार करो, वरना अस्तित्व पर सवाल उठेंगे।
समस्या कहां है? कानून में या क्रियान्वयन में?
RERA कानून अपने ढांचे में मजबूत माना जाता है। समस्या अधिकतर राज्यों में इसके क्रियान्वयन को लेकर देखी जा रही है।
कुछ प्रमुख चुनौतियां—
-
मामलों की लंबित संख्या बढ़ना
-
आदेशों के पालन में देरी
-
अपीलीय ट्रिब्यूनल में खाली पद
-
राज्यों के बीच नियमों में असमानता
यानी कानून मौजूद है, लेकिन उसकी प्रभावी निगरानी और सख्ती हर जगह समान नहीं है।
बिल्डरों और खरीदारों के बीच संतुलन
रियल एस्टेट सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। इसमें लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। इसलिए नियमन और विकास के बीच संतुलन जरूरी है।
लेकिन यह भी सच है कि—
-
देरी से प्रोजेक्ट
-
अधूरी सुविधाएं
-
एकतरफा एग्रीमेंट
ने वर्षों तक खरीदारों को परेशान किया है।
RERA इसी असंतुलन को ठीक करने के लिए आया था। अगर वही संस्था सवालों के घेरे में है, तो इसका असर बाजार के भरोसे पर पड़ेगा।
क्या समाधान है?
RERA को खत्म करना शायद समाधान नहीं, बल्कि सुधार की जरूरत का संकेत है।
संभावित सुधार—
-
समयबद्ध सुनवाई की सख्त निगरानी
-
आदेशों के पालन में कठोर दंड
-
डिजिटल ट्रैकिंग और पारदर्शिता
-
राज्यों में एकरूपता
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को एक अवसर की तरह देखा जाना चाहिए— व्यवस्था को मजबूत करने के लिए।
निष्कर्ष: भरोसे की नींव हिलनी नहीं चाहिए
घर खरीदने वाला व्यक्ति अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षित भविष्य के लिए निवेश करता है।
RERA का अस्तित्व तभी सार्थक है जब—
-
खरीदार को समय पर न्याय मिले
-
बिल्डर जवाबदेह हों
-
प्रक्रिया सरल और पारदर्शी हो
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी एक चेतावनी है कि कानून का उद्देश्य कागजों तक सीमित न रहे।
अगर RERA अपने लक्ष्य को मजबूती से निभाए, तो यह खत्म करने की नहीं, और मजबूत बनाने की संस्था है।
लेकिन यदि वह कमजोर पड़ती है, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है।
देश के करोड़ों घर खरीदारों की नजर अब इस पर है—
क्या RERA सुधरेगी, या व्यवस्था में बड़ा बदलाव होगा?
Comments
Post a Comment