बस 10 मिनट दीजिए सर…’ 19 साल के छात्र ने बिना वकील लड़ा केस, सुप्रीम कोर्ट में पलटा फैसला
NEET छात्र अथर्व चतुर्वेदी को सुप्रीम कोर्ट से राहत, EWS आरक्षण पर बड़ा आदेश
![]() |
| अथर्व चतुर्वेदी को सुप्रीम कोर्ट ने दी बड़ी राहत (सोशल मीडिया) |
फरवरी की एक दोपहर, जब सुनवाई लगभग खत्म होने वाली थी, तभी 19 साल के एक छात्र ने कोर्ट से कहा— “मुझे बस 10 मिनट दीजिए, सर…”
यह छात्र कोई वकील नहीं, बल्कि NEET क्वालिफाई कर चुका एक उम्मीदवार था, जो डॉक्टर बनना चाहता है। कुछ ही मिनटों की बहस के बाद मामला पलट गया और Supreme Court of India ने बड़ा आदेश जारी कर दिया।
कोर्ट ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के योग्य छात्रों को MBBS में प्रोविजनल प्रवेश दिया जाए।
क्या है पूरा मामला?
जबलपुर (मध्य प्रदेश) के रहने वाले 19 वर्षीय अथर्व चतुर्वेदी ने NEET परीक्षा दो बार क्वालिफाई की और 530 अंक हासिल किए। अंक अच्छे होने के बावजूद उन्हें MBBS की सीट नहीं मिल सकी।
कारण था— राज्य सरकार द्वारा निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू न किया जाना।
अथर्व ने पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने खुद ही सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की।
उन्होंने जबलपुर से ऑनलाइन याचिका दायर की और ऑनलाइन ही सुनवाई में पेश हुए। जब मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या वे खुद बहस करेंगे, तो उन्होंने आत्मविश्वास से ‘हां’ कहा।
आर्टिकल 142 के तहत मिला आदेश
सुनवाई के दौरान अथर्व ने तर्क दिया कि संविधान की मूल भावना वंचित वर्गों को अवसर देने की है। उन्होंने EWS आरक्षण से जुड़े पुराने फैसलों का भी हवाला दिया।
राज्य के वकील ने कहा कि निजी कॉलेजों को लेकर नीति विचाराधीन है। इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर निजी कॉलेज आरक्षण नीति का पालन नहीं करते, तो उन पर कार्रवाई की जाए।
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए आदेश दिया कि 2025–26 सत्र के लिए योग्य EWS छात्र को फीस जमा करने की शर्त पर प्रोविजनल एडमिशन दिया जाए।
साथ ही राज्य सरकार को सात दिनों के भीतर कॉलेज आवंटित करने का निर्देश भी दिया गया।
हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
इससे पहले Madhya Pradesh High Court ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि राज्य सरकार को नीति लागू करने के लिए समय दिया गया है।
हालांकि, हाई कोर्ट के जज ने उनकी दलीलों की तारीफ करते हुए कहा था—
"आपको वकील बनना चाहिए, डॉक्टर नहीं। आप गलत क्षेत्र में हैं।"
लेकिन अथर्व ने हार नहीं मानी और सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
क्यों अहम है यह फैसला?
यह मामला सिर्फ एक छात्र की जीत नहीं है। यह उन सभी EWS छात्रों के लिए उम्मीद की किरण है, जो नीतिगत अस्पष्टता के कारण मेडिकल सीट से वंचित रह जाते हैं।
फैसले के प्रमुख बिंदु:
-
योग्य छात्र को नीति की कमी के कारण प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।
-
निजी मेडिकल कॉलेज भी आरक्षण नीति से बाहर नहीं हो सकते।
-
राज्य सरकार को तय समय में कार्रवाई करनी होगी।
परिवार और पृष्ठभूमि
अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी पेशे से वकील हैं। अथर्व ने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की है। उनका चयन जबलपुर के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में भी हो गया था, लेकिन उन्होंने मेडिकल क्षेत्र को चुना।
हालांकि, निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS फीस तय न होने के कारण परिवार की आर्थिक चिंता अब भी बनी हुई है।
निष्कर्ष
यह खबर बताती है कि हिम्मत और संविधान पर विश्वास हो तो न्याय की राह खुल सकती है।
19 साल के एक छात्र ने बिना वकील सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखी और देश की सबसे बड़ी अदालत को यह याद दिलाया कि संविधान का मकसद हर योग्य छात्र को समान अवसर देना है।
अथर्व चतुर्वेदी की यह लड़ाई सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता और समान अधिकार की लड़ाई मानी जा रही है।
Atharv Chaturvedi, NEET 2026, EWS Reservation, Supreme Court Order, MP Student News, MBBS Admission, Article 142

Comments
Post a Comment